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Ladakh Protest Turns Violent: BJP Office Attacked राज्य की मांग में युवाओं का गुस्सा फूटा

लद्दाख का आंदोलन: शांति से हिंसा तक

लद्दाख Ladakh , वो ऊंची वादियां जहां हवा साफ है और जीवन की रफ्तार धीमी। लेकिन 24 सितंबर 2025 को लेह की सड़कें आग और धुएं से भर गईं। राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों का धैर्य टूट गया। जो आंदोलन शांतिपूर्ण भूख हड़ताल से शुरू हुआ था, वो हिंसा की भेंट चढ़ गया। बीजेपी का कार्यालय जलाया गया, पुलिस वाहन को आग लगाई गई, और पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा। इस सबके बीच चार लोग जान गंवा बैठे, और करीब 70 घायल हो गए। लेह में कर्फ्यू लग गया है, लेकिन सवाल वही है – क्या ये गुस्सा बेकार जाएगा?

आंदोलन की जड़ें: राज्य क्यों, छठी अनुसूची क्यों?

लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। तब वादा था – विकास, सुरक्षा, और स्थानीय अधिकार। लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि ये वादे कागजों पर ही रह गए। लेह और कारगिल के लोग, जो 97% से ज्यादा अनुसूचित जनजाति से हैं, अपनी जमीन, नौकरियां और संस्कृति की रक्षा चाहते हैं। मुख्य मांगें साफ हैं:

  • राज्य का दर्जा: केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य बनना, ताकि लोकसभा-राज्यसभा में अलग सीटें मिलें और स्थानीय फैसले खुद लिए जा सकें।
  • छठी अनुसूची: ये संवैधानिक प्रावधान आदिवासी इलाकों को स्वायत्तता देता है – जमीन पर बाहरी हस्तक्षेप रोकना, पर्यावरण बचाना, और स्थानीय शासन मजबूत करना। असम, मेघालय जैसे राज्यों में ये काम कर रहा है, लेकिन लद्दाख में नहीं।

ये मांगें नई नहीं। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) पिछले चार साल से केंद्र से बात कर रहे हैं। मई 2025 में आखिरी दौर की बात हुई, जिसमें डोमिसाइल पॉलिसी और 85% नौकरियों में आरक्षण पर सहमति बनी। लेकिन कोर मुद्दे – राज्य और छठी अनुसूची – लटके रहे। 20 सितंबर को केंद्र ने 6 अक्टूबर को नई वार्ता का न्योता दिया, लेकिन प्रदर्शनकारी इसे देरी मानते हैं।

हिंसा का चेहरा: युवाओं का ‘जनरेशन Z आंदोलन’

24 सितंबर का दिन शुरू तो शांतिपूर्ण था। LAB की यूथ विंग ने बंद का आह्वान किया, सैकड़ों युवा एनडीएस मेमोरियल ग्राउंड से मार्च निकाला। नारे लगे – “राज्य दो, छठी अनुसूची दो!” लेकिन बीजेपी कार्यालय के बाहर हालात बिगड़ गए। पत्थरबाजी हुई, आग लग गई। एक पुलिस वाहन और LAHDC बिल्डिंग को भी नुकसान पहुंचा। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गए, जहां युवा गुस्से में चिल्ला रहे थे।

कई रिपोर्ट्स इसे “जनरेशन Z आंदोलन” बता रही हैं। ये वो युवा हैं जो 2019 के बाद पैदा हुए या बड़े हुए – बेरोजगारी, पर्यावरण खतरे, और बाहरी निवेश से डरते हैं। एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हमारी जमीन बिक रही है, हमारी आवाज दबी है।” लेकिन हिंसा ने आंदोलन को कमजोर कर दिया। सोनम वांगचुक, वो पर्यावरणविद् जिनकी भूख हड़ताल ने आग लगाई, ने खुद कहा – “ये दुखद है। मेरा शांतिपूर्ण संदेश फेल हो गया। युवाओं से अपील, रुको। ये हमारी लड़ाई को नुकसान पहुंचाता है।”

भूख हड़ताल का अंत: सोनम वांगचुक की अपील

सोनम वांगचुक – ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म के प्रोटोटाइप, जो हिमालय बचाने के लिए लड़ते हैं। 10 सितंबर से 15 साथियों के साथ 35 दिनों की भूख हड़ताल पर थे। 23 सितंबर को दो लोग अस्पताल पहुंचे, हालत बिगड़ी। हिंसा के बीच वांगचुक ने हड़ताल खत्म की। कहा, “हम अस्थिरता नहीं चाहते। केंद्र संवेदनशील बने।” उनका वीडियो X पर वायरल हुआ, जहां वो युवाओं से शांति की गुजारिश कर रहे थे। KDA ने 25 सितंबर को कारगिल में बंद का ऐलान किया है।

मौतें और घायल: कर्फ्यू की मजबूरी

हिंसा में चार मौतें – ज्यादातर युवा। 70 से ज्यादा घायल, दो की हालत नाजुक। एक CRPF जवान भी चोटिल। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 163 के तहत कर्फ्यू लगाया – पांच से ज्यादा लोगों का जमावड़ा बैन। अतिरिक्त फोर्स तैनात। पूर्व J&K DGP सेश पॉल वैद ने कहा, “हिंसा जवाब नहीं।”

राजनीतिक रंग: बीजेपी पर निशाना क्यों?

प्रदर्शनकारियों का गुस्सा बीजेपी पर फूटा। 2020 में LAHDC चुनाव जीतने वाली पार्टी पर वादाखिलाफी का आरोप। कुछ पोस्ट्स में कांग्रेस काउंसलर को हिंसा भड़काने का दोषी ठहराया गया। लेकिन असली मुद्दा केंद्र की चुप्पी लगता है। अमित शाह से अपीलें हो रही हैं – वार्ता जल्दी शुरू करो।

आगे क्या? 6 अक्टूबर की उम्मीद

केंद्र ने LAB-KDA को 6 अक्टूबर को दिल्ली बुलाया है। थुपस्टान छेवांग लीड करेंगे। लेकिन प्रदर्शनकारी कहते हैं – “परिणाम-उन्मुख बात हो, वरना आंदोलन जारी।” लद्दाख के चुनाव अक्टूबर में हैं, हिंसा का असर पड़ेगा। पर्यावरण, संस्कृति और सुरक्षा के बीच फंसा ये इलाका अब राजनीतिक फैसले मांग रहा है।

लद्दाख का दर्द समझ आता है – ऊंचाइयों पर रहने वाले लोग अपनी पहचान बचाना चाहते हैं। लेकिन हिंसा से कुछ नहीं मिलेगा। केंद्र को संवाद बढ़ाना होगा, वरना ये चिंगारियां बड़ी आग बन सकती हैं। क्या 6 अक्टूबर वो मोड़ बनेगा? वक्त बताएगा।

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