Arunachal pradesh अरुणाचल प्रदेश में उबाल, स्थानीय संगठनों ने खोला मोर्चा
24 नवंबर 2025 :Arunachal pradesh अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में पिछले कुछ हफ्तों से अवैध अप्रवासी विरोधी आंदोलन तेज हो गया है। ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन (AAPSU), अरुणाचल इंडिजिनस ट्राइब्स फोरम (AITF) समेत कई जनजातीय संगठनों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि बांग्लादेशी और म्यांमार (रोहिंग्या सहित) मूल के वे सभी लोग जो बिना वैध दस्तावेज के राज्य में रह रहे हैं, उन्हें तुरंत बाहर किया जाए। संगठनों का कहना है कि अब “चुप रहने का समय खत्म हो चुका है”।
Arunachal pradesh स्थानीय लोगों का गुस्सा क्यों?
स्थानीय निवासियों और छात्र संगठनों ने तीन प्रमुख मुद्दे गिनाए हैं, जिन्होंने इस आंदोलन को हवा दी है:
1. सांस्कृतिक पहचान पर खतरा
अरुणाचल की 26 से ज्यादा प्रमुख जनजातियों और 100 से अधिक उप-जनजातियों की अपनी विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाज और पारंपरिक आस्था है। लोग डरते हैं कि बाहरी आबादी की बेतहाशा वृद्धि से उनकी यह अनूठी पहचान खतरे में पड़ जाएगी। AAPSU के महासचिव तोबित कुरिया ने कहा, “हमारी संस्कृति हमारी पहचान है। हम इसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते।”
2. जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ने का डर
कई जिलों में गैर-आदिवासियों की संख्या तेजी से बढ़ने की खबरें हैं। संगठनों का आरोप है कि अवैध अप्रवासी फर्जी दस्तावेज बनाकर स्थायी प्रमाण-पत्र (ST/PRC) हासिल कर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में विधानसभा और लोकसभा सीटों का परिसीमन भी प्रभावित हो सकता है।
3. इनर लाइन परमिट (ILP) व्यवस्था की धज्जियाँ
अरुणाचल प्रदेश बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन-1873 के तहत इनर लाइन परमिट क्षेत्र में आता है। बाहरी भारतीयों को भी यहाँ आने के लिए ILP लेना अनिवार्य है, लेकिन बांग्लादेशी और म्यांमार के लोग बिना किसी परमिट के वर्षों से बसे हुए हैं। संगठनों ने इसे “राज्य की सुरक्षा और संप्रभुता पर हमला” करार दिया है।
सरकार भी सख्त, जिला टास्क फोर्स गठित
स्थानीय संगठनों के लगातार प्रदर्शन और केंद्र सरकार से मिले निर्देशों के बाद अरुणाचल प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद सभी 27 जिलों में जिला टास्क फोर्स (District Task Force – DTF) का गठन कर दिया गया है।
DTF में शामिल होंगे:
– जिला उपायुक्त (अध्यक्ष)
– पुलिस अधीक्षक
– जनजातीय मामलों के अधिकारी
– खुफिया ब्यूरो के प्रतिनिधि
– स्थानीय जनजातीय संगठनों के नामित सदस्य
टास्क फोर्स का काम:
– घर-घर सर्वे
– मजदूर ठिकानों, दुकानों, होटलों में छापेमारी
– ILP, आधार कार्ड, वोटर आईडी, जन्म प्रमाण-पत्र आदि की गहन जाँच
– संदिग्ध पाए जाने वालों को हिरासत में लेकर निर्वासन प्रक्रिया शुरू करना
पहले चरण में राजधानी क्षेत्र, परशुराम कुंड, तिनसुकिया सीमा से सटे जिले और लोअर सुबनसिरी, पापुम पारे जैसे संवेदनशील इलाकों में अभियान शुरू हो चुका है।
केंद्र का साथ, असम मॉडल पर चल रही तैयारी
केंद्र सरकार ने भी अरुणाचल को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि “असम में जिस तरह NRC और डिटेंशन सेंटर की प्रक्रिया चली, उसी तर्ज पर अरुणाचल में भी वैज्ञानिक तरीके से पहचान और निर्वासन का काम किया जाएगा।”
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
– BJP : पार्टी ने इसे “स्थानीय लोगों की भावनाओं का सम्मान” बताया और कहा कि आदिवासियों के हित सर्वोपरि हैं।
– कांग्रेस : प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नबाम तुकी ने कहा कि यह मुद्दा वर्षों से लंबित था, लेकिन सत्ता में रहते हुए उनकी सरकार ने भी ठोस कदम नहीं उठाए थे।
– कुछ छोटे क्षेत्रीय दल और NGO मानवाधिकार का हवाला देकर विरोध कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनका प्रभाव नगण्य है।
आगे क्या?
AAPSU ने 15 दिसंबर तक का अल्टीमेटम दिया है कि यदि बड़े पैमाने पर निर्वासन शुरू नहीं हुआ तो पूरे राज्य में चक्का जाम और बंद का आह्वान किया जाएगा। दूसरी तरफ सरकार ने साफ कहा है कि “कानून के दायरे में रहते हुए हर अवैध अप्रवासी को बाहर किया जाएगा।”
अरुणाचल प्रदेश एक बार फिर अपनी “आदिवासी पहचान” और “भूमि अधिकार” की रक्षा के लिए सड़कों पर है। आने वाले दिन बताएँगे कि यह आंदोलन कहाँ तक जाता है और कितने लोग वास्तव में राज्य छोड़ने को मजबूर होते हैं।
(रिपोर्ट : स्थानीय संवाददाताओं और संगठन सूत्रों के आधार पर)
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