SC ST आरक्षण लाभ नहीं -धर्मांतरित ईसाइयों को : ‘संविधान पर धोखा’
SC ST अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी से धर्मांतरण करके ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्तियों को अब आरक्षण और अन्य लाभ नहीं मिल पाएंगे। यह फैसला भारत सरकार का सीधा निर्णय नहीं है, बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ा निर्देश दिया है, जिसमें कहा गया है कि धर्मांतरित ईसाई व्यक्तियों को अनुसूचित जाति के लाभ जारी रखना ‘संविधान के साथ धोखा’ है।
यह निर्देश पिछले साल नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले की पृष्ठभूमि में आया है, जिसने इस विषय पर कानूनी स्थिति को और स्पष्ट कर दिया है।
SC ST प्रमुख विन्दु: हाईकोर्ट का आदेश और कानूनी आधार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्देश जारी किया। इस निर्देश का मुख्य आधार संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 में निहित है।
1. संविधान का स्पष्ट प्रावधान
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का पैरा 3 स्पष्ट रूप से कहता है:
“इस आदेश के पैरा 2 में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से भिन्न धर्म को मानता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं समझा जाएगा।”
इस प्रावधान के अनुसार, ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति कानूनी तौर पर अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता।
2. सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी (2024)
उच्च न्यायालय ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले (सी. सेल्वरानी बनाम विशेष सचिव-सह-जिला कलेक्टर) का उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था:
“आरक्षण का लाभ उठाने के लिए धर्म परिवर्तन करना, जबकि अन्य धर्म में वास्तविक विश्वास न हो, ‘संविधान के साथ धोखा’ माना जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि एक व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाने के बाद अपनी मूल जाति की पहचान खो देता है।
3. जाति व्यवस्था का सिद्धांत
न्यायालयों ने दोहराया है कि अनुसूचित जाति को आरक्षण का लाभ सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन तथा सदियों से चली आ रही जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए दिया जाता है। चूंकि ईसाई धर्मशास्त्र जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं देता है, इसलिए यह माना जाता है कि धर्मांतरण के बाद व्यक्ति को उस भेदभाव से मुक्ति मिल जाती है, जिसके आधार पर आरक्षण दिया जाता है।
राज्य सरकार को निर्देश और समय सीमा
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव और सभी जिला मजिस्ट्रेटों (DMs) को सख्त निर्देश दिए हैं:
-
पहचान और रोकथाम: सभी जिला मजिस्ट्रेटों को 4 महीने की समय सीमा के भीतर ऐसे मामलों की पहचान करने और उन्हें रोकने के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी।
-
जाँच: कोर्ट ने उस याचिकाकर्ता के मामले में भी जांच के आदेश दिए, जिसने ईसाई होने के बावजूद हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया था, ताकि वह आरक्षण का लाभ लेता रह सके।
आरक्षण नीति के ‘मूल सिद्धांत’ पर जोर
यह कानूनी फैसला एक बार फिर आरक्षण नीति के मूल सिद्धांत पर ज़ोर डालता है। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि उन समुदायों को सामाजिक न्याय प्रदान करना है जो ऐतिहासिक रूप से जाति-आधारित उत्पीड़न का शिकार हुए हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन लोगों पर नकेल कसने में सहायक होगा जो कथित तौर पर दोहरी पहचान (आरक्षण के लिए हिंदू/सिख/बौद्ध और धार्मिक लाभ के लिए ईसाई) का उपयोग कर रहे हैं।
यह निर्णय पूरे देश में धर्मांतरित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की चल रही बहस को फिर से हवा देगा, जिसके लिए कई समूह लंबे समय से मांग कर रहे हैं।
also read:-छत्तीसगढ़ के बीजापुर में भीषण मुठभेड़: 12 खूंखार नक्सली ढेर, 3 जवान शहीद
follow us:-Pentoday | Facebook
