व्यंग्य: “इंतजार मेरी जान…” — जब ट्रंप के ‘ईगो’ से टकराया भारत का ‘मौन’

भारत :- वॉशिंगटन के गलियारों से एक ऐसी “करुण कथा” निकलकर आई है, जिसे सुनकर किसी को भी अमेरिका की हालत पर तरस आ सकता है। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने रोते-बिलखते हुए (पॉडकास्ट में) खुलासा किया है कि उनके ‘बॉस’ डोनाल्ड ट्रंप हाथ में व्यापार समझौते की फाइल लिए फोन की घंटी बजने का इंतजार करते रह गए, लेकिन दिल्ली से “रिंगटोन” सुनाई नहीं दी।
एक फोन कॉल की कीमत तुम क्या जानो ट्रंप बाबू?
लुटनिक का दर्द यह है कि उन्होंने पूरी बिसात बिछाई थी, कालीन बिछाया था और बस एक ‘कॉल’ का इंतजार था। लेकिन पीएम मोदी ने शायद फोन को ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ (DND) पर डाल दिया। अमेरिका को लगा था कि उनकी ‘शर्तों’ की घुड़की सुनकर भारत दौड़ता हुआ आएगा, लेकिन यहाँ तो मामला ही उल्टा पड़ गया। अब लुटनिक कह रहे हैं कि “मोदी जी ने फोन नहीं किया, इसलिए हमने डील वियतनाम को दे दी।”
यह तो वही बात हुई कि अंगूर मिले नहीं, तो अब कह रहे हैं कि अंगूर खट्टे हैं!
‘स्टेयरकेस’ वाली धमकी और भारत का ‘लिफ्ट’ वाला स्वैग
अमेरिका ने धमकी दी कि हमारी डील “सीढ़ियों” (Staircase) जैसी है, जो देर करेगा उसे नुकसान होगा। लेकिन उन्हें शायद अंदाजा नहीं था कि भारत अब सीढ़ियों से नहीं, बल्कि अपनी ‘इंडिपेंडेंट पॉलिसी’ की लिफ्ट से चलता है। ट्रंप प्रशासन को इस बात की सबसे ज्यादा मिर्ची लगी है कि भारतीय सरकार उनके 50% टैरिफ और रूस वाले ‘जुर्माने’ को भाव तक नहीं दिया।
‘व्यापारी’ ट्रंप बनाम ‘जिद्दी’ भारत
पूरी दुनिया जानती है कि ट्रंप हर चीज को एक दुकान की तरह देखते हैं। लुटनिक का बयान दरअसल उनकी इसी ‘झल्लाहट’ का नतीजा है। अमेरिका चाहता था कि भारत अपना बाजार उनके मक्के (Corn) और सामानों के लिए खोल दे, बदले में भारत को उनकी शर्तों पर नाचना था। भारत ने नचाया तो जरूर, लेकिन वह ‘नाच’ अमेरिका को पसंद नहीं आया क्योंकि ढोल भारत ने अपने हिसाब से बजाया।
“ट्रेन छूट गई” या पटरी ही बदल गई?
लुटनिक कहते हैं कि भारत के लिए “ट्रेन छूट गई”। सच तो यह है कि भारत ने शायद अपनी खुद की ‘वंदे भारत’ चला दी है जो वॉशिंगटन के स्टेशन पर रुकती ही नहीं। अमेरिका अब इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ डील करके खुद को दिलासा दे रहा है, जैसे कोई बच्चा किसी बड़े से हारने के बाद छोटी टॉफी लेकर खुश हो जाता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका का ‘ईगो’ इस बात से आहत है कि दुनिया का सबसे बड़ा बाजार उनकी उंगलियों पर नाचने के बजाय, उन्हें अपनी ताल पर नचा रहा है। लुटनिक का यह बयान कूटनीति कम और “दिल टूटे आशिक” की शिकायत ज्यादा लग रहा है।
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