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Labour code श्रम संहिताओं और निजीकरण के खिलाफ ट्रेड यूनियनों, किसान समूहों का राष्ट्रव्यापी विरोध!

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Labour code श्रम संहिताओं और निजीकरण के खिलाफ ट्रेड यूनियनों, किसान समूहों का राष्ट्रव्यापी विरोध!

labour code :केंद्र सरकार की चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) और सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण की नीतियों के खिलाफ देश भर की प्रमुख ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों और बिजली कर्मचारियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया है। विरोध करने वाले समूहों का आरोप है कि ये नीतियां ‘मजदूर विरोधी’, ‘किसान विरोधी’ और ‘कॉरपोरेट समर्थक’ हैं।

Labour code मुख्य विरोध: श्रम संहिताएं (लेबर कोड्स)

सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर चार नई श्रम संहिताओं को अधिसूचित किया है, जिनका देशभर में व्यापक विरोध हो रहा है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि ये नए कानून श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करते हैं।

Labour code विरोध के प्रमुख कारण:

  • स्थायी रोजगार की समाप्ति: यूनियनों का कहना है कि नए कानूनों में फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट (निश्चित अवधि का रोजगार) को वैध करने से स्थायी नौकरियां बड़े पैमाने पर खत्म हो जाएंगी और नौकरी की सुरक्षा (Job Security) कम हो जाएगी।

  • काम के घंटे: नए प्रावधानों में 12 घंटे तक ड्यूटी का विकल्प दिए जाने का विरोध किया गया है, जबकि यूनियनें 8 घंटे की ड्यूटी को बनाए रखने या 6 घंटे के कार्य दिवस की मांग कर रही हैं।

  • यूनियन की शक्ति कमजोर: विरोधियों का मानना है कि यूनियन को मान्यता देने की सीमा (10% से बढ़ाकर 20%) और हड़ताल से जुड़े कड़े नियमों के कारण ट्रेड यूनियनों के संगठन बनाने और सामूहिक कार्रवाई के अधिकार कमजोर होंगे।

  • छंटनी और तालाबंदी: ‘औद्योगिक संबंध संहिता’ के तहत, सरकार की अनुमति के बिना छंटनी या तालाबंदी (Layoff/Lockout) के लिए कर्मचारियों की संख्या की सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 कर्मचारी कर दिया गया है, जिससे कंपनियों को कर्मचारियों को निकालने में आसानी होगी।

  • सामाजिक सुरक्षा की कमी: गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान केवल कागजों तक सीमित है और उन्हें न्यूनतम वेतन की गारंटी नहीं दी गई है।

निजीकरण और बिजली संशोधन बिल का विरोध

ट्रेड यूनियनों, विशेष रूप से विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति से जुड़े बिजली कर्मियों ने सरकार की निजीकरण की नीति का कड़ा विरोध किया है।

मुख्य मुद्दे:

  • बिजली संशोधन बिल 2025: बिजली कर्मियों ने इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 को वापस लेने की मांग की है। उनका मानना है कि यह बिल बिजली वितरण निगमों के निजीकरण को बढ़ावा देगा, जिससे बिजली दरों में बढ़ोतरी होगी और कर्मचारियों के लिए रोजगार संकट पैदा होगा।

  • सार्वजनिक क्षेत्र का विनिवेश: विभिन्न यूनियनों ने रेलवे, कोयला खनन और रक्षा क्षेत्र सहित सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (PSUs) के निजीकरण और विनिवेश को तुरंत रोकने की मांग की है।

किसान संगठनों का समर्थन

इस राष्ट्रव्यापी विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) जैसे प्रमुख किसान संगठन भी शामिल हुए हैं, जिन्होंने मज़दूरों की मांगों का समर्थन किया है।

किसानों की प्रमुख मांगें:

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी: किसान स्वामीनाथन आयोग के फार्मूले के आधार पर एमएसपी पर फसल खरीद की कानूनी गारंटी देने की मांग कर रहे हैं।

  • कर्ज माफी: किसान और कृषि श्रमिकों के लिए ऋण माफी की मांग भी ज्ञापन में शामिल है।

आगे की रणनीति

प्रदर्शनकारी संगठनों ने जिला मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन किया और उपायुक्तों के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे अपने आंदोलन को और उग्र रूप देंगे, जिसमें देशव्यापी हड़ताल (भारत बंद) भी शामिल हो सकता है।


 

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