इंदौर में 15 सालों से सीधे छात्रसंघ चुनाव नहीं: ‘बिना चुनाव के कैसे मिलेंगे नेता?’ – हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
इंदौर, मध्य प्रदेश – देश को राजनीतिक नेतृत्व देने वाली नर्सरी माने जाने वाले कॉलेज और विश्वविद्यालयों में सीधे छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग अब एक बार फिर जोर पकड़ रही है। इंदौर में पिछले लगभग 15 सालों से सीधे चुनाव न होने के कारण छात्र राजनीति का माहौल थम सा गया है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
इंदौर क्यों रोके गए हैं सीधे छात्रसंघ चुनाव?
मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों को साल 2006 में हुए उज्जैन के माधव कॉलेज में एक प्रोफेसर (प्रो. एच.एस. सभरवाल) की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या की घटना के बाद अनिश्चित काल के लिए रोक दिया गया था।
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अप्रत्यक्ष प्रणाली: हालांकि कुछ समय तक छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए अप्रत्यक्ष प्रणाली (Indirect Election) जारी रही, लेकिन यह भी समय के साथ लगभग समाप्त हो गई।
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2017 के बाद पूरी तरह रोक: प्रदेश में आखिरी बार छात्र प्रतिनिधि चुनाव 2017 में हुए थे, लेकिन उसके बाद से वे भी पूरी तरह से बंद हैं।
हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका का तर्क
इंदौर हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि छात्रसंघ चुनाव न कराना छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है और यह देश के भविष्य के नेतृत्व के लिए भी खतरा है।
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नेतृत्व विकास पर संकट: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि अगर छात्रों को कॉलेज स्तर पर ही लोकतंत्र की प्रक्रिया और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का मौका नहीं मिलेगा, तो भविष्य में देश को सशक्त राजनीतिक और सामाजिक नेता कैसे मिलेंगे?
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लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें: याचिका में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य की गई लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का हवाला दिया गया है, जो कॉलेजों में छात्रसंघ चुनावों के लिए एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करती हैं। इन सिफारिशों का पालन न करने पर सवाल उठाया गया है।
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शुल्क में कटौती की मांग: कुछ याचिकाओं में यह भी तर्क दिया गया है कि जब छात्रसंघ चुनाव ही नहीं हो रहे हैं, तो कॉलेजों द्वारा छात्रों से छात्र संघ शुल्क (Student Union Fee) लेना अनुचित है, और इस शुल्क को तत्काल बंद या कम किया जाना चाहिए।
राजनीतिक दलों और छात्रों की मांग
इंदौर, जो देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) और उससे संबद्ध सैकड़ों कॉलेजों का केंद्र है, वहाँ के प्रमुख छात्र संगठन (जैसे ABVP और NSUI) भी लंबे समय से चुनाव बहाली की मांग कर रहे हैं।
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संगठनों का तर्क: छात्र संगठनों का कहना है कि चुनाव बंद होने से कॉलेजों में छात्रों की समस्याओं को उठाने वाला कोई वास्तविक लोकतांत्रिक प्रतिनिधि नहीं है, जिससे कॉलेज प्रशासन की मनमानी बढ़ी है।
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सरकार का रुख: राज्य सरकार ने पूर्व में कोर्ट में यह तर्क दिया है कि छात्रसंघ चुनाव कराना छात्रों का मौलिक अधिकार नहीं है, और सुरक्षा तथा शैक्षणिक माहौल बनाए रखने के लिए चुनाव कराना आवश्यक नहीं है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क पर सख्त टिप्पणी करते हुए सवाल किया था कि जब सांसद और विधायक के चुनाव हो सकते हैं, तो छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं?
इस याचिका पर हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से जवाब मांगा है, और अब सभी की निगाहें कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं।
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