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“औरंगजेब की कब्र हटाने की चाहत, पर कांग्रेस के कानून ने बांधे हाथ: फडणवीस का बयान”

“औरंगजेब की कब्र हटाने की चाहत, पर कांग्रेस के कानून ने बांधे हाथ: फडणवीस का बयान”

महाराष्ट्र में मुगल शासक औरंगजेब की कब्र को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आजमी के औरंगजेब की तारीफ करने वाले बयान के बाद शुरू हुआ विवाद अब नई दिशा ले रहा है। आजमी को उनके बयान के चलते महाराष्ट्र विधानसभा से 26 मार्च तक के लिए निलंबित कर दिया गया है। इस बीच, औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपनी बात रखी और कहा कि वह भी इस मजार को हटाना चाहते हैं, लेकिन कानूनी अड़चनें उनके हाथ बांध रही हैं।

फडणवीस ने शनिवार रात मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान यह बात कही। दरअसल, मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज और बीजेपी सांसद उदयनराजे भोसले ने छत्रपति संभाजीनगर में स्थित औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग उठाई थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए फडणवीस ने कहा, “हम सभी की यही भावना है कि इसे हटाया जाए। लेकिन यह काम कानून के दायरे में ही करना होगा। यह जगह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है, और यह संरक्षण कांग्रेस सरकार के समय दिया गया था।”

उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि इस मसले पर जल्दबाजी नहीं की जा सकती, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। फडणवीस का कहना था कि भले ही लोगों की भावनाएं इस कब्र को हटाने के पक्ष में हों, लेकिन एएसआई के नियम और संरक्षित स्थल की स्थिति इसे जटिल बना रही है।

दूसरी ओर, अबू आसिम आजमी के बयान ने इस विवाद को और हवा दी। आजमी ने औरंगजेब को महान बताते हुए कहा था कि इतिहास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनके इस बयान पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने कड़ा एतराज जताया। बीजेपी और शिवसेना ने इसे छत्रपति शिवाजी और संभाजी महाराज का अपमान करार दिया। नतीजतन, आजमी को विधानसभा से निलंबित कर दिया गया।

यह पहली बार नहीं है जब औरंगजेब की कब्र को लेकर बहस छिड़ी हो। छत्रपति संभाजीनगर में स्थित यह मजार लंबे समय से विवादों में रही है। कई संगठन और नेता इसे हटाने की मांग करते रहे हैं, लेकिन एएसआई के संरक्षण के चलते कोई ठोस कदम नहीं उठ सका। फडणवीस के इस बयान ने एक बार फिर इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या सरकार कोई कानूनी रास्ता निकाल पाएगी या यह मसला सिर्फ सियासी बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा।

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