अयोध्या राम मंदिर से पीएम मोदी का बड़ा संदेश:’गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति पर ज़ोर
अयोध्या राम मंदिर के शिखर पर ‘धर्म ध्वज’ फहराने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में एक स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक संदेश दिया। उन्होंने सामाजिक समावेशिता, ‘राम राज्य’ के आदर्शों और ‘विकसित भारत’ के विजन पर जोर देते हुए, हाशिए पर पड़े समूहों तक पहुंचने और ‘गुलामी की मानसिकता’ को पूरी तरह से छोड़ने का आह्वान किया।

अयोध्या :सामाजिक समावेशिता और ‘सबका साथ’ का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण की शुरुआत में उन सभी संतों, भक्तों, कारीगरों और ‘श्रमवीरों’ को नमन किया, जिन्होंने मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। उन्होंने विशेष रूप से वंचित और हाशिए के समुदायों को साधने की कोशिश की, जिसके संकेत ध्वजारोहण से पहले के उनके कार्यक्रमों में भी दिखे:
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सप्त मंदिर दर्शन: ध्वजारोहण से पहले, पीएम मोदी ने परिसर में मौजूद महर्षि वाल्मीकि, निषाद राज गुह, माता शबरी और देवी अहिल्या को समर्पित मंदिरों के दर्शन किए।
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राम का भाव: उन्होंने कहा कि भगवान राम ‘भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं।’ राम व्यक्ति का कुल नहीं देखते, बल्कि उसकी भक्ति को महत्व देते हैं। यही कारण है कि उन्होंने निषाद राज को गले लगाया और माता शबरी के जूठे बेर भी खाए।
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सामूहिक शक्ति: प्रधानमंत्री ने जोर दिया कि विकसित भारत के संकल्प की पूर्ति तभी संभव है, जब समाज की सामूहिक शक्ति एकजुट होगी। राम मंदिर का यह दिव्य प्रांगण भारत की चेतना स्थली बन रहा है, जो सभी जातियों और वर्गों को साथ लेकर चलेगा।
अयोध्या: गुलामी की मानसिकता’ छोड़ने पर सबसे बड़ा ज़ोर
पीएम मोदी के भाषण का एक मुख्य बिंदु ‘गुलामी की मानसिकता’ से पूर्ण मुक्ति का आह्वान था। उन्होंने आने वाले 10 वर्षों में इस मानसिकता को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य रखा:
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मैकाले की विरासत पर प्रहार: उन्होंने 1835 में लॉर्ड मैकाले द्वारा भारत में थोपी गई उस मानसिक गुलामी की नींव का ज़िक्र किया, जिसके कारण भारतीय अपनी विरासत को कम आंकने लगे।
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विरासत पर गर्व: प्रधानमंत्री ने कहा, “हमें आज़ादी तो मिली, लेकिन वह विकार नहीं गया। हमारे यहां एक हीन भावना आ गई कि विदेश की हर चीज़ अच्छी है और हमारी अपनी चीज़ों में खोट ही खोट है।” उन्होंने देशवासियों से अपनी विरासत पर गर्व करने का आह्वान किया।
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रामत्व को नकारना: उन्होंने कहा कि यही गुलामी की मानसिकता थी, जिसने वर्षों तक रामत्व को नकारा और प्रभु राम को भी ‘काल्पनिक’ घोषित किए जाने का प्रयास किया।
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प्रतीकों में परिवर्तन: उन्होंने भारतीय नौसेना के ध्वज से गुलामी के प्रतीक को हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित करने का उदाहरण दिया। यह केवल डिज़ाइन का बदलाव नहीं, बल्कि मानसिकता बदलने का क्षण था।
‘राम राज्य’ और ‘विकसित भारत’ का विजन
पीएम मोदी ने राम मंदिर के माध्यम से आने वाली सदियों के लिए भारत की नींव मजबूत करने का संकल्प दोहराया और राम के आदर्शों को ‘विकसित भारत’ के लिए अनिवार्य बताया:
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राम: मूल्य, मर्यादा और दिशा: उन्होंने कहा कि राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक मूल्य, एक मर्यादा और एक दिशा हैं।
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विकसित भारत के लिए ‘राम को जगाना’: “अगर भारत को साल 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है… तो हमें अपने भीतर ‘राम’ को जगाना होगा। अपने भीतर के राम की प्राण-प्रतिष्ठा करनी होगी।”
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राम राज्य के आदर्श: उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास की चौपाइयों का ज़िक्र करते हुए ‘राम राज्य’ के चार स्तंभों को आज का संकल्प बताया:
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‘बैर न बिग्रह आस न त्रासा, सुखमय ताहि सदा सब आसा’: समाज में शांति, सुख, और भेदभाव से मुक्ति हो।
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‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना’: एक ऐसा समाज बनाएं जहां गरीबी, दुख या लाचारी न हो।
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‘प्राण जाए पर वचन न जाई’: जो कहा जाए, वही किया जाए।
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‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’: विश्व में कर्म और कर्तव्य की प्रधानता हो।
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मुख्य संदेश
अयोध्या से पीएम मोदी का संदेश स्पष्ट था: राम मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है। यह ध्वज एक तरफ सामाजिक समरसता और समावेशी राजनीति का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ यह राष्ट्र को हीन भावना और गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके आत्मनिर्भर और विकसित बनाने के लिए प्रेरित करता है।
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