Assam असम में 75 साल बाद ‘प्रवासी निष्कासन अधिनियम, 1950’ का कड़ा इस्तेमाल
गुवाहाटी, असम:Assam असम सरकार ने एक ऐतिहासिक और विवादास्पद कदम उठाते हुए 75 साल पुराने ‘इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950’ को सक्रिय कर दिया है। सोनितपुर जिले के प्रशासन ने पांच लोगों—जिन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल ने ‘घोषित विदेशी’ करार दिया था—को मात्र 24 घंटे का नोटिस देकर असम और भारत से ‘खुद को हटाने’ का आदेश जारी किया।
यह फैसला राज्य की सुरक्षा, संसाधनों की रक्षा और अवैध घुसपैठ रोकने के लिए उठाया गया है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर सीधा हमला है। इस कदम ने न केवल असम, बल्कि पूरे देश में तीखी बहस छेड़ दी है, जहां सोशल मीडिया से लेकर संसदीय गलियारों तक आवाजें उठ रही हैं।
Assam घटना का पूरा ब्योरा: कौन हैं ये पांच लोग और कैसे पहुंचा मामला यहां?
सोनितपुर जिले के धोबोकाटा गांव के निवासी—हनूफा, मरियम नेसा, फातिमा, मोनोवारा और अमजद अली—के खिलाफ 2006 में बॉर्डर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की थी। ये मामले सोनितपुर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल नंबर 2 को भेजे गए, जहां सालों की लंबी प्रक्रिया के बाद इस साल (2024) इन्हें ‘विदेशी’ घोषित किया गया। ट्रिब्यूनल के फैसले के आधार पर 19 नवंबर 2025 को जिला मजिस्ट्रेट आनंद कुमार दास ने धारा 2 के तहत एक्सपल्शन ऑर्डर जारी किया।
ऑर्डर में साफ-साफ लिखा है: “आपको Assam असम/भारत के क्षेत्र से 24 घंटे के अंदर धुबरी/श्रीभूमि/साउथ सलमारा-मंकाचार रूट से खुद को हटाना होगा। यदि आदेश का पालन नहीं किया गया, तो सरकार उपयुक्त कार्रवाई करने को बाध्य होगी।” यह समय सीमा गुरुवार (20 नवंबर) को समाप्त हो चुकी है। पुलिस के मुताबिक, ये पांचों व्यक्ति फरार हैं। गांव वालों का कहना है कि ये परिवार 20 साल पहले मध्य असम से यहां आए थे, लेकिन संदेह के घेरे में आने के बाद चले गए।
यह पहली बार है जब 1950 के इस कानून का इस्तेमाल इतने कठोर रूप में किया गया है। कानून के तहत, घोषित विदेशियों को ट्रिब्यूनल या न्यायिक अपील की प्रतीक्षा के बिना सीधे निष्कासित किया जा सकता है। इसके अलावा, इनके नाम मतदाता सूची से हटाने, राशन कार्ड रद्द करने, आधार कार्ड फ्रीज करने और सरकारी योजनाओं से बाहर करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
Assam कानून का इतिहास: विभाजन की छाया में जन्मा, नेहरू ने रोका था अमल
‘इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950’ को 1 मार्च 1950 को लागू किया गया था। यह कानून स्वतंत्र भारत के शुरुआती दिनों में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से हो रही घुसपैठ को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने असम की मांग पर बनाया था। मूल रूप से इसे ‘अनडिजायरेबल इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट’ नाम दिया गया था, जो ‘अनचाहे घुसपैठियों’ पर निशाना साधता था।
कानून की धारा 2 कहती है कि यदि केंद्र या राज्य सरकार को लगे कि किसी व्यक्ति की असम में मौजूदगी ‘सार्वजनिक हित, किसी वर्ग या अनुसूचित जनजाति के हितों के लिए हानिकारक’ है, तो उसे निर्दिष्ट समय और रूट से राज्य या देश से बाहर करने का आदेश दिया जा सकता है। लेकिन लागू होने के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका अमल रोक दिया। इतिहासकार अरुपज्योति सैकिया की किताब ‘द क्वेस्ट फॉर मॉडर्न असम’ के अनुसार, 1950 में ही लोअर असम में सांप्रदायिक दंगे हुए, जिसमें 40,000 से 1 लाख मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान भाग गए। उसके बाद यह कानून दशकों तक ‘सुप्त’ रहा।
2025 में असम कैबिनेट ने सितंबर में इसकी एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) को मंजूरी दी, जिसके तहत जिला मजिस्ट्रेट को 10 दिनों में नागरिकता का प्रमाण मांगने और असंतोषजनक सबूत पर 24 घंटे का नोटिस देने का अधिकार मिला। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “ट्रिब्यूनल में 82,000 मामले लंबित हैं। यह कानून अवैध प्रवासियों को तुरंत निष्कासित करने का तेज तरीका है।” सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले साल धारा 6ए (सिटिजनशिप एक्ट) की वैधता बरकरार रखते हुए असम को इस कानून का इस्तेमाल करने की छूट दी थी।
Assam सरकार का पक्ष: ‘सुरक्षा और संसाधनों की रक्षा के लिए जरूरी’
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे ‘ऐतिहासिक कदम’ बताया। उन्होंने कहा, “असम की जनसांख्यिकी बदल रही है। बांग्लादेश से अनियंत्रित घुसपैठ ने सिविल असंतोष पैदा किया है। यह कानून राज्य की सुरक्षा, आंतरिक शांति और संसाधनों की रक्षा के लिए आवश्यक है।” भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इसे सराहा। एक यूजर ने लिखा, “हिमंता दा ने दिखा दिया कि कानून की रीढ़ कहां होती है। कोई ट्रिब्यूनल, कोई देरी नहीं—सीधी कार्रवाई!” (पोस्ट [post:1])।
सरकार के अनुसार, असम में 1,140 बीघा से अधिक जमीन अवैध कब्जे से मुक्त कराई गई है, और हाल ही में 6 बांग्लादेशी व 10 रोहिंग्या को डिपोर्ट किया गया। गौहाटी हाईकोर्ट ने भी कहा है कि यदि डिपोर्टेशन संभव न हो, तो घोषित विदेशियों को नौकरी, जमीन मालिकी और शादी तक से वंचित किया जा सकता है।
आलोचकों की चिंता: लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल
सरकार के इस कदम पर कई नागरिक समाज समूहों और विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई है।
-
न्यायिक सुनवाई का अभाव: आलोचकों का तर्क है कि ट्रिब्यूनल या लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बिना, केवल प्रशासनिक आदेश पर किसी व्यक्ति को देश से निष्कासित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाता है।
-
मनमानी कार्रवाई का डर: बिना किसी स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के इस कानून का उपयोग, विशेषकर कमजोर और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए मनमानी कार्रवाई और उत्पीड़न का रास्ता खोल सकता है। कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित भी बताया है।
यह कदम न केवल असम में बल्कि पूरे देश में अवैध प्रवासन और नागरिकता के मुद्दे पर एक नई और तीखी बहस छेड़ चुका है, जिसका प्रभाव देश की प्रवासी नीति पर दूरगामी हो सकता है।
