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राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे

वंदे मातरम्

राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे

BY – SHIVENDRA RAWAT (PENTODAY)

राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” के 150 वर्ष आज (7 नवंबर 2025) पूरे हो गए हैं! यह ऐतिहासिक क्षण है, जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत का पहला प्रकाशन 7 नवंबर 1875 को बंगाली साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में हुआ था। यह गीत न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना, बल्कि आज भी राष्ट्रप्रेम की ज्योति जलाता रहता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बंकिमचंद्र ने मूल रूप से यह गीत 1870 के दशक में लिखा था, लेकिन इसका पहला प्रकाशन 1875 में हुआ। बाद में 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में इसे शामिल किया गया। यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन का नारा बन गया। 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीतबद्ध कर गाया। स्वतंत्रता के बाद, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्र गीत का दर्जा दिया, जो “जन गण मन” के समकक्ष है।

150 वर्ष पूर्ति का उत्सव

राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे

आज से एक वर्ष तक (7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक) देशभर में इसके 150 वर्ष पूर्ति का राष्ट्रीय स्तर पर उत्सव मनाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नई दिल्ली में एक विशेष कार्यक्रम का उद्घाटन किया, जिसमें ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग्स, ऐतिहासिक दस्तावेज़ और सांस्कृतिक प्रदर्शनियां शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “वंदे मातरम् राष्ट्रवाद की शाश्वत ज्योति जलाता रहता है, जो युवाओं में एकता और देशभक्ति की भावना जगाता है।”

यह उत्सव स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को इसके क्रांतिकारी महत्व से जोड़ेगा। ऑनलाइन पोर्टल 150 Years of Vande Mataram पर गीत के इतिहास, रिकॉर्डिंग्स और कहानियां उपलब्ध हैं।

वंदे मातरम्
वंदे मातरम्

संपूर्ण गीत के बोल (देवनागरी में)

सुजलां सुफलां मलयजशीतलां
शस्यश्यामलां मातरम् ॥
वंदे मातरम् ॥ 

शुभ्रज्योत्सनापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीं
सुखदां वरदां मातरम् ॥
वंदे मातरम् ॥ 

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैरधृत-करकरवाले
अबला केन मा एते बलम् ॥
वंदे मातरम् ॥ 

त्वं हि विद्या त्वं हि धर्मः
त्वं हि हृदि त्वं हि मर्मः
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बहुते त्वं हि शक्तिः
हृदये त्वं हि भक्तिः
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ॥
वंदे मातरम् ॥ 

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला, कमलदलविहारिणी
वाणी, वरदायिनी, नमामि त्वम्
नमामि कमलां अमलां अतुलां
सुजलां सुफलां मातरम् ॥
वंदे मातरम् ॥ 

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम् ॥
वंदे मातरम् ॥ 

(कुछ संस्करणों में अतिरिक्त स्तुतियाँ हैं, लेकिन मूल ५-७ स्तुतियों तक मानी जाती हैं। ऊपर दिया गया संस्करण सबसे प्रामाणिक है।)

हिंदी अनुवाद (संक्षिप्त भावार्थ)

प्रथम स्तुति: मैं वंदना करता हूँ मातृभूमि की, जो जलपूर्ण, फलपूर्ण, मलय पवन से शीतल, शस्यों से श्यामल (हरी-भरी) है। जो शुभ्र ज्योति (चाँदनी) से पुलकित रात्रि है, फुल्ल कुसुमित वृक्षदल से शोभिनी है। सुहासिनी (मुस्कुराती), सुमधुर भाषिणी, सुखदायिनी तथा वरदायिनी मातृभूमि को वंदन करता हूँ।

द्वितीय स्तुति: सप्त करोड़ कंठों से कलकल निनाद करने वाली, द्विसप्त करोड़ भुजाओं से खरकरवाले धारण करने वाली! हे अथाक्तो! तू इतनी बलवान क्यों? बहुबल धारिणी, तारिणी, शत्रु दल वारिणी मातृभूमि को नमस्कार करता हूँ।

तृतीय स्तुति: तू विद्या है, तू धर्म है, तू हृदय में है, तू मर्म (आत्मा) है, तू ही शरीर में प्राण है। बाहु में तू माँ की शक्ति, हृदय में तू माँ की भक्ति, तेरी ही प्रतिमा हर मंदिर में स्थापित है।

चतुर्थ स्तुति: तू ही दुर्गा है, दस प्रहरण धारिणी; कमला (लक्ष्मी) है, कमल दल पर विहारिणी; वाणी (सरस्वती) है, विद्या दायिनी। तुझे नमस्कार करता हूँ, अमल कमला, अतुल कमला को नमस्कार। जलपूर्ण, फलपूर्ण मातृभूमि को वंदन।

पंचम स्तुति: श्यामल (हरित), सरल (सरल), सुस्मिता (मधुर मुस्कान) वाली, भूषित (आभूषित) धरा को धारण करने वाली मातृभूमि को वंदन।

महत्वपूर्ण नोट

  • राष्ट्र गीत का हिस्सा: केवल पहली दो स्तुतियाँ ही आधिकारिक हैं, क्योंकि बाद की स्तुतियाँ में कुछ धार्मिक उल्लेख (जैसे दुर्गा, लक्ष्मी) हैं, जो विविधता वाले देश में संवेदनशीलता का विषय बने। नेहरू,और गाँधी आदि ने इसी कारण सीमित किया।
  • संगीत: मूल संगीत रवींद्रनाथ टैगोर और बाद में जदुनाथ भट्टाचार्य ने दिया।
  • प्रभाव: यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणा स्रोत था, लेकिन आज भी पूर्ण रूप से साहित्यिक महत्व रखता है।

गीत का महत्व

“वंदे मातरम्” मातृभूमि को देवी के रूप में पूजता है। इसकी पहली दो पंक्तियाँ—वंदे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्, शस्यश्यामलां मातरम्—प्रकृति की समृद्धि और सौंदर्य का वर्णन करती हैं। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों जैसे अरविंद घोष, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के लिए प्रेरणा स्रोत था। आज यह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।

150 वर्षों में यह गीत फिल्मों, संगीत और साहित्य में अमर हो चुका है। आइए, इस अवसर पर हम सब मिलकर गाएँ: वंदे मातरम्!

जय हिंद!

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