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देविका रोटवान : 9 साल की बच्ची जिसने कसाब को फांसी दिलाई, और 17 साल बाद भी घर-नौकरी के लिए लड़ रही है

देविका रोटवान 

देविका रोटवान

बचपन और परिवार

देविका रोटवान का जन्म 1999 में राजस्थान के एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता नत्थू लाल रोटवान मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे मुंबई में फुटपाथ पर गैस-बर्नर ठीक करने का छोटा-मोटा काम करते थे। माँ और दो भाई-बहन भी थे। परिवार बहुत गरीब था और कई बार फुटपाथ पर ही सोना पड़ता था।

26 नवंबर 2008 की रात – जब सब कुछ बदल गया

देविका रोटवान 
देविका रोटवान

देविका उस समय सिर्फ 9 साल की थीं। 26 नवंबर 2008 की शाम को वे अपनी माँ और छोटे भाई के साथ CST रेलवे स्टेशन (तत्कालीन VT स्टेशन) पर थीं। वे लोग राजस्थान जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। रात करीब 9:45 बजे अजमल आमिर कसाब और अबु इस्माइल प्लेटफॉर्म पर AK-47 लेकर घुसे और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी।

देविका ने बाद में बताया:
“मैंने देखा कि एक लंबा लड़का (कसाब) और दूसरा छोटा कद वाला (इस्माइल) गोली चला रहे थे। मैं चिल्लाई ‘मम्मी भागो’, लेकिन तभी मेरी दाहिनी जांघ में गोली लगी। मैं गिर पड़ी और खून बहने लगा। मेरे सामने कई लोग मरते हुए गिरे। मैं बेहोश हो गई।”

उन्हें सबसे पहले सेंट जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया, फिर जेजे अस्पताल में भर्ती किया गया। डॉक्टरों ने गोली निकाली, लेकिन नसें क्षतिग्रस्त हो गई थीं। आज भी उनके पैर में प्लेट लगी हुई है और कभी-कभी दर्द होता है।

अस्पताल में पहचान और बहादुरी की शुरुआत

देविका
देविका

घायल होने के कुछ दिन बाद ही पुलिस देविका से पूछताछ करने आई। उन्होंने कसाब की फोटो दिखाई। 9 साल की बच्ची ने बिना डरे कहा –
“ये वही है जिसने गोली मारी। मैंने इसे बहुत करीब से देखा था।”

यह पहली बार था जब किसी जीवित गवाह ने कसाब की पहचान की थी।

अदालत में गवाही – 10 साल की उम्र में कसाब को आमने-सामने देखा

मई 2009 में जब देविका सिर्फ 10 साल की थीं, उन्हें आर्थर रोड जेल की स्पेशल कोर्ट में गवाही के लिए बुलाया गया। कसाब कांच के बुलेटप्रूफ बॉक्स में खड़ा था। जज ने पूछा –
“क्या तुम डर रही हो?”
देविका ने कहा – “नहीं सर, मुझे कोई डर नहीं है। मैं सच बोलूंगी।”

फिर उन्होंने कसाब की ओर इशारा करके कहा –
“ये वही आदमी है जिसने CST पर गोली चलाई थी। मैंने इसे देखा था।”

यह गवाही बहुत महत्वपूर्ण थी क्योंकि कसाब ने शुरू में सब कुछ नकार दिया था। देविका की गवाही के बाद उसका झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया।

कसाब की फांसी और देविका की प्रतिक्रिया

21 नवंबर 2012 को जब कसाब को पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई, देविका ने टीवी पर खबर देखी और रो पड़ी। बाद में उन्होंने कहा –
“मैं खुद उसे गोली मारना चाहती थी। आज मुझे सुकून है।”

उसके बाद का जीवन – संघर्षों भरा

– 2014 तक परिवार मुंबई में फुटपाथ और चॉल में रहता रहा।
– देविका ने पढ़ाई जारी रखी। चेतना कॉलेज, बांद्रा से उन्होंने 12वीं पास की, फिर बीए में दाखिला लिया।
– लेकिन पैर की पुरानी चोट के कारण उन्हें बहुत दर्द होता था, जिससे पढ़ाई प्रभावित हुई।
– परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि कई बार इलाज के लिए पैसे नहीं होते थे।

घर के लिए 17 साल का संघर्ष

2009 से ही देविका और उनके परिवार ने महाराष्ट्र सरकार से घर की मांग की थी।
– मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, सोनिया गांधी, उद्धव ठाकरे, देवेंद्र फडणवीस – हर सरकार से गुहार लगाई।
– 2023 में राजस्थान सरकार ने उन्हें जयपुर में घर देने का वादा किया, लेकिन बाद में मुकर गई।
– आखिरकार जून 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट के कड़े आदेश के बाद MHADA ने मुंबई में EWS फ्लैट आवंटित किया। अभी वे उसमें शिफ्ट होने की तैयारी कर रही हैं।

अब तक मिले सम्मान

देविका
देविका

– महाराष्ट्र सरकार से संजीवनी पुरस्कार और 5 लाख रुपये (2010)
– कई स्कूलों-कॉलेजों में सम्मान
– कौन बनेगा करोड़पति (2019) में आमंत्रित
– भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी के साथ मंच साझा किया
– 2025 में तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण पर मीडिया में फिर सुर्खियों में आईं

वर्तमान स्थिति (नवंबर 2025)

– उम्र: 26 साल
– रहने की जगह: अभी भी बांद्रा ईस्ट की छोटी चॉल में, जल्द ही MHADA फ्लैट में शिफ्ट होंगी
– पढ़ाई: बीए अधूरा (आर्थिक कारणों से)
– सपना: IPS बनना था, अब भी राष्ट्रसेवा करना चाहती हैं
– आर्थिक स्थिति: अभी भी बहुत कमजोर, कोई स्थायी नौकरी या सरकारी मदद नहीं
– स्वास्थ्य: पैर में दर्द बना रहता है

देविका आज भी कहती हैं

“मैंने देश के लिए गवाही दी, कसाब को फांसी दिलाई, लेकिन बदले में मुझे सिर्फ तमगे और फोटो मिले। मैं आज भी संघर्ष कर रही हूँ। फिर भी मुझे गर्व है कि मैंने सच कहा और देश की मदद की।”

देविका रोटवान की कहानी सिर्फ एक बच्ची की बहादुरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि हम अपने बहादुरों का सम्मान कितना करते हैं।

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