पेन टुडे , 20 अगस्त 2025 – भारत और चीन ने सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में एक नया समझौता किया है, जिसे दोनों देशों ने “ऐतिहासिक प्रगति” करार दिया है। इसके तहत एक विशेषज्ञ समूह बनाया जाएगा, जो सीमा निर्धारण (Boundary Delimitation) पर काम करेगा। साथ ही, सीमा व्यापार, कैलाश मानसरोवर यात्रा और जल-डेटा साझा करने जैसे कदमों पर सहमति बनी है। लेकिन क्या यह समझौता वाकई में स्थायी शांति की गारंटी देता है, या यह केवल सतही प्रगति है? आलोचकों और विशेषज्ञों ने इस पर सवाल उठाए हैं।
समझौते का दायरा
नए समझौते में कम संवेदनशील क्षेत्रों से शुरूआत करते हुए चरणबद्ध सीमा निर्धारण और अंततः औपचारिक चिन्हांकन (Demarcation) का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा, पूर्वी, पश्चिमी और मध्य सेक्टरों में सैन्य-कूटनीतिक संवाद को बढ़ाने, सीधी उड़ानों की बहाली, लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला दर्रों पर सीमा व्यापार शुरू करने, और 2026 से कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने जैसे कदम शामिल हैं। सीमापार नदियों पर सहयोग और आपातकालीन जल-डेटा साझा करने की सहमति भी एक सकारात्मक कदम मानी जा रही है।
आलोचकों की चिंताएं
हालांकि सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि बता रही है, कई विशेषज्ञ और विश्लेषक इस समझौते की सीमाओं और संभावित खामियों की ओर इशारा कर रहे हैं:
- अस्पष्ट समयसीमा: समझौते में सीमा निर्धारण और चिन्हांकन के लिए कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं दी गई है। रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल (रिटायर्ड) विनोद शर्मा ने कहा, “बिना समयबद्ध योजना के यह समझौता लंबे समय तक लटक सकता है, जैसा कि पहले भी देखा गया है।”
- संवेदनशील क्षेत्रों पर चुप्पी: समझौता कम संवेदनशील क्षेत्रों पर केंद्रित है, लेकिन डेप्सांग और डेमचोक जैसे विवादित और तनावपूर्ण क्षेत्रों पर कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है। विश्लेषकों का कहना है कि इन क्षेत्रों को नजरअंदाज करना भविष्य में तनाव को फिर से बढ़ा सकता है।
- विश्वास की कमी: 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में विश्वास की भारी कमी रही है। विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. रंजना कुमारी ने चेतावनी दी, “चीन के साथ पिछले समझौतों का रिकॉर्ड देखते हुए, हमें सतर्क रहना होगा। क्या यह समझौता केवल दिखावटी है, या वास्तव में स्थायी समाधान की दिशा में ले जाएगा?”
- आर्थिक और रणनीतिक लागत: सीमा व्यापार और उड़ानों की बहाली को सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत को आर्थिक रूप से चीन पर अधिक निर्भर बना सकता है, खासकर तब जब वैश्विक भू-राजनीति में दोनों देश अलग-अलग खेमों में खड़े हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ और चुनौतियां
2024 का सीमा गश्त समझौता (Patrol Agreement) तनाव कम करने में मददगार रहा था, लेकिन यह नया समझौता उससे आगे बढ़कर “स्थायी समाधान” की बात करता है। फिर भी, आलोचकों का कहना है कि बिना पारदर्शिता और ठोस कार्यान्वयन के, यह समझौता केवल कागजी प्रगति बनकर रह सकता है। इतिहास में कई बार भारत-चीन समझौते भरोसे की कमी और अमल में ढिलाई के कारण कमजोर पड़ चुके हैं।
जनता और विपक्ष की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस समझौते को शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया, लेकिन कई यूजर्स ने इसे “दिखावटी” करार दिया। एक यूजर ने लिखा, “जब तक डेप्सांग और डेमचोक जैसे हॉटस्पॉट्स पर सहमति नहीं बनती, यह समझौता अधूरा है।” विपक्षी नेताओं ने भी सरकार से सवाल किया है कि क्या यह समझौता भारत की रणनीतिक स्थिति को कमजोर तो नहीं करेगा।
भविष्य की राह
यह समझौता निश्चित रूप से भारत-चीन संबंधों में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसकी सफलता कार्यान्वयन की पारदर्शिता और दोनों पक्षों के बीच विश्वास पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अपनी रणनीतिक और सैन्य तैयारियों को कमजोर किए बिना इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा। साथ ही, जनता और विपक्ष को विश्वास में लेना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
निष्कर्ष
भारत-चीन सीमा समझौता एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर संदेह बरकरार हैं। क्या यह वास्तव में स्थायी शांति की ओर ले जाएगा, या केवल एक अस्थायी राहत है? यह सवाल समय और दोनों देशों की प्रतिबद्धता ही जवाब दे पाएंगे।
